हालांकि बिल्कुल मेरी ही तरह

हालांकि बिल्कुल मेरी ही तरह
मेरी कविता भी कुछ नहीं कह पाती
लेकिन फिर भी मैं यह देख अवाक हूं
कि हवा के स्नेहमयी स्पर्श ने
कविता से बंधे शब्दों के
अविच्छिन्न मौन के भीतर
संचरित कर दिया है
एक स्पन्दन।

हमें इन सबकी चाहिए सूचना

हमें इन सबकी चाहिए सूचना
जानना है हमें कि
जितना लिखा जाता है हमारे नाम
उतना पैसा क्यों नहीं मिलता ?
दिन भर मजदूरी करके
गढ़ते हैं महल
फिर क्यों टपकती है
हमारी खपरैली छतें ?
आटा, नमक, तेल
क्यों होते जा रहे हैं
हमारी पहुंच से दूर?
हमें इन सबकी जानकारी चाहिए
हमारे जीने के लिए
ज़रूरी है यह सब कुछ जानना।

समन्दर की एक लहर हो

समन्दर की एक लहर हो
मेरे लिए तुम ।
जो बहुत ऊपर उठकर
नीचे आते हुए
मुझे अन्दर तक भिगो जाती है।
मेरे लिए तुम
तुम गंगाजल की अंजुरि भर बूंदें हो मेरे लिए
जिन्हें गटक कर मैं स्वयं को पवित्र करता हूं
तुम मेरे लिए हो मुट्ठी भर उजास
जिसे मैंने हथेली पर रख
अंगुलियों से ढक दिया है
और इसी उजास की प्यास
निरन्तर बनी हुई है मेरे लिए।

गीत गति से चलता लेकिन

गीत गति से चलता लेकिन,
प्रीत नहीं चलती उतनी।
प्रायोगिक मन उड़ता है,
पर हवा चले उतना जितनी।
मन के भीतर दो हिस्‍से है,
मन ही मन से लड़ता है।
आकुल व्‍याकुल रोज रोज,
मन को समझाना पड़ता है।

-डा. कुंजन