समन्दर की एक लहर हो

समन्दर की एक लहर हो
मेरे लिए तुम ।
जो बहुत ऊपर उठकर
नीचे आते हुए
मुझे अन्दर तक भिगो जाती है।
मेरे लिए तुम
तुम गंगाजल की अंजुरि भर बूंदें हो मेरे लिए
जिन्हें गटक कर मैं स्वयं को पवित्र करता हूं
तुम मेरे लिए हो मुट्ठी भर उजास
जिसे मैंने हथेली पर रख
अंगुलियों से ढक दिया है
और इसी उजास की प्यास
निरन्तर बनी हुई है मेरे लिए।

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