हालांकि बिल्कुल मेरी ही तरह

हालांकि बिल्कुल मेरी ही तरह
मेरी कविता भी कुछ नहीं कह पाती
लेकिन फिर भी मैं यह देख अवाक हूं
कि हवा के स्नेहमयी स्पर्श ने
कविता से बंधे शब्दों के
अविच्छिन्न मौन के भीतर
संचरित कर दिया है
एक स्पन्दन।

हमें इन सबकी चाहिए सूचना

हमें इन सबकी चाहिए सूचना
जानना है हमें कि
जितना लिखा जाता है हमारे नाम
उतना पैसा क्यों नहीं मिलता ?
दिन भर मजदूरी करके
गढ़ते हैं महल
फिर क्यों टपकती है
हमारी खपरैली छतें ?
आटा, नमक, तेल
क्यों होते जा रहे हैं
हमारी पहुंच से दूर?
हमें इन सबकी जानकारी चाहिए
हमारे जीने के लिए
ज़रूरी है यह सब कुछ जानना।

समन्दर की एक लहर हो

समन्दर की एक लहर हो
मेरे लिए तुम ।
जो बहुत ऊपर उठकर
नीचे आते हुए
मुझे अन्दर तक भिगो जाती है।
मेरे लिए तुम
तुम गंगाजल की अंजुरि भर बूंदें हो मेरे लिए
जिन्हें गटक कर मैं स्वयं को पवित्र करता हूं
तुम मेरे लिए हो मुट्ठी भर उजास
जिसे मैंने हथेली पर रख
अंगुलियों से ढक दिया है
और इसी उजास की प्यास
निरन्तर बनी हुई है मेरे लिए।

गीत गति से चलता लेकिन

गीत गति से चलता लेकिन,
प्रीत नहीं चलती उतनी।
प्रायोगिक मन उड़ता है,
पर हवा चले उतना जितनी।
मन के भीतर दो हिस्‍से है,
मन ही मन से लड़ता है।
आकुल व्‍याकुल रोज रोज,
मन को समझाना पड़ता है।

-डा. कुंजन

एक टुकडा आसमान

घुड़सवार
****************************
चौराहे-दर-चौराहे
गुजरते गुजरते
महसूस होता है कभी
कि अब उग आई है समझ
कि कब कहा और कैसे
मील के पत्थरों से रूबरू होना है?
सोचने और करने तक के
फासले की दूरी
बहुत सोच के बाद भी नहीं मिट पाई
समझ कभी हैरान
कभी परेशान
और कभी खुद पर खीझती
कोसती है सोच को।
सोचती है
सूचियो में बंधे लक्ष्यों को
जरूरत है
तीक्ष्ण ऊर्जा
एवं पैने प्रयासों की
परतु हर भोर के साथ
उत्साह की बिखरती रश्मियां
वह समेट ही नहीं पाता।
बस चलता है
और चलता रहता है।
इस विश्वास के साथ
कि कुछ रश्मियां
करती रहेंगी प्रकाशवान
उसके मार्ग को
कभी बेपरवाह
हर क्षण, हर वजूद से
तो कभी
ढेरों चिंताओं का
और डर के दुष्चक्र में पिसता
कच्ची उम्र का वह घुड़सवार
खुद का बहुत अच्छा
विश्लेषक होने के बावजूद
खुद को कभी नहीं समझ पाया।
लगाम को पकड़ना
और अश्व से खेलने का शौक
कब षड़यंत्रों का हिस्सा बन जाएगा
इन सब से अनभिज्ञ
बिल्कुल बेखबर था वह।
हर तरफ से लापरवाह
घुड़सवार दौड़े जा रहा है
चौराहा-दर-चौराहा।
कहीं गरम, झुलसाती हवाएं
कहीं शीतल बयार
कहीं धुंआ
तो कहीं ठिठुरन ।
सूरज ने भी असहमति जता दी
कि उसके नाम की कोई लकीर
उसके हाथ में बने।
शनि की वक्रदृष्टि
कभी उसके सपनों को
झुलसा देती है
चौराहों पर हजारों चेहरों से
मिलते बिछुड़ते
घुड़सवार कहीं खो जाता है।
वह भूल जाता है
कि उसे कहां जाना है ?
अपरिपक्वता उसकी सच्चाई है
परन्तु औपचारिक गम्भीरता
और उससे जुड़े दायित्वों को ढोता
घुड़सवार कभी महसूस करता है
खुद को हताश
निराश और टूटा हुआ।
वेदना के क्षण
उसके अन्तस को कचोट जाते हैं
पीड़ा की अनुभूति
शौक का व्यवसाय बनना देखती है
और देखती है
कि विकल्पों के लिए छोड़े गये
रिक्त स्थानों में
जम रही है महीन मिट्टी की परतें।
घुड़सवार ठड़ लगाता है
तेज, बहुत तेज
कभी बदहवास सा
कहीं गिर पड़ता है
फिर लड़खड़ा कर
एकदम उठता है
और चलता है।
गुजरता जाता है
चौराहा-दर-चौराहा
पर उसे नहीं पता
कि किधर है उसका गंतव्य ?
कौन सी है मंज़िल?
और उसे कहां जाना है.. ?
**********************
मौन
****************************
हर अवसर पर
बस यही सोच कर चुप रह लेता हूं
कि मेरे शब्द
शायद नहीं हो पाएंगे मुखर।
मैं भी देखता हूं एक स्वप्न
धवल चांदनी
और उसके चपल संवेगों में लिपटी
मदहोश कर देने वाली महक का
परंतु महक और उसका अंतरंग शिल्प
मेरी शाब्दिक अभिव्यक्ति की सीमा में
कभी नहीं बंध पाया।
मैने चाहा
बहुत चाहा
रूबरू हुआ उन सजीले शब्दों से
घंटों अकेले में
पर नियति ने
उन शब्दों को बांध दिया है
मेरे उस अहम के साथ
जो किसी कोने में दबा, छिपा है।
माहौल की गरमी पाते ही
उठ खडा होता है वह
अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के साथ
उसकी विशाल संरचना
जबरन ढंक लेती है
मेरी कल्पना के सतरंग
संवेदनाओं की खुशबू
और मेरी आत्मीय अभिरूचि की जिजीविषा।
मेरे मन के भीतर छिपे
सैंकड़ों मन
अनिच्छा के बावजूद
दब जाते हैं उसके भार तले।
माहौल में ठण्डक पसरने के साथ ही
अहम का वजूद भी
अचानक घट जाता है
वह निढाल हो जाता है
गिर पड़ता है मन के बिल्कुल समीप।
मन कोमलांगी वजूद
कोसता है उसे
करता है मिन्नतें
और मागता है
कुछ स्नेहमयी सौगातें।
चंचल मन में बसी गम्भीर समझ
मेरे एकांत की हैरानी है
चटख चांदनी जब कभी छिटक पड़ती है
मेरे आंगन में
मैं उसे आश्चर्य का स्पर्श दे
निहारता हूं
और बस निहारता हूं।
मेरा स्निग्ध मौन
चांदनी के हर प्रतिरूप को खला है।
हमेशा ही
निढाल अहम के कुछ स्वेदकण
छू जाते हैं मानस को
और यही सोच कर चुप रह लेता हूं
कि नहीं दे पाऊंगा भावनाओं को
शब्दों की औपचारिक मुखरता
बस यही कारण रहा
कि चांद को प्रायः मेरे व
चांदनी के बीच
पसरा हुआ दिखा
एक निष्ठुर मौन…।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:59 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
मन के भीतर का मन
****************************
हवा का एक झोंका
मुझे छू कर
हौले से यूं गुनगुना देगा
मुझे पता भी न था।
स्वच्छ नीले और विशाल गगन के
विस्तृत पटल पर
वैसे तो हवाओं को
लहराते, इठलाते और मुस्कुराते हुए
कई-कई बार देखा है।
नदी की प्रवाहमान जलराशि को
छेड़कर दरख्तों से लिपट जाना
फूलों को गुदगुदा कर
अस्ताचल पर क्षितिज में विलीन हो जाना
कभी चंदा के साथ
घंटों खिलखिलाना
और अचानक स्मृति में तब्दील हो
क्षण-क्षण का अवसाद छोड़ जाना
हवाओं की फितरत रही है।
कई मन भावन रंगों से सजी
और भांति-भांति की खुशबूओं में लिपटी
हवाओं की कई प्रतिकृतियों को
फूलों के साथ
घंटों बतियाते देखा है मैंने।
जीवन के हर पहलू से जुड़ी
हवाओं के इन करतबों का
दर्शक भर मैं
इक झौंके के मृदु स्पर्श से
जाने कब गुनगुना दिया
खुद मुझे भी पता न चला
हवा ने रची शब्दों की सृष्टि
शब्द और शब्दों में बंधे प्रतीक
और प्रतीकों में लिपटी कविताएं।
मैं समझ भी नहीं पाया था
कि बादल, सागर व लहर के संवादों का साक्षी
हवा का वह झोंका
जाने कब
मुझसे लिखवा गया एक कविता।
हालांकि बिल्कुल मेरी ही तरह
मेरी कविता भी कुछ नहीं कह पाती
लेकिन फिर भी मैं यह देख अवाक हूं
कि हवा के स्नेहमयी स्पर्श ने
कविता से बंधे शब्दों के
अविच्छिन्न मौन के भीतर
संचरित कर दिया है
एक स्पन्दन।
कविताओं से जुड़ा मन का कोई कोना
हथेलियों से आंखों को बन्द कर
चाहता है हवा की गोद में
सिर छुपाना।
मन के भीतर का कोई एक मन
हवा के भीतर छुपे झोंके को
जी लेना चाहता है।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:56 am 2 टिप्पहणियां:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
सम्बन्ध
****************************
सूने और निस्तेज मन में
एक खूबसूरत आत्मिक सम्बन्ध ने
प्रवाहित की उत्साह की ऊर्जा।
ऊर्जा खुशबू बनी
और छा गयी
अन्तःकरण के समूचे परिवेश पर
ऊर्जा का संचार पा कर
मन ठिठका, रुका
झुक कर खुद को देखा
आंखों को गोलाई में घुमाते
माहौल को टटोला
कंधों को उचकाया
दोनों हाथ जेब में डाले
और फिर चल पड़ा।
ऊर्जा संगीत बनी
और सूने मन में गुंजायित हो उठी
सौम्य संगीत की सहस्त्रों आवृत्तियां।
संगीत ने दिया मानस को मृदु स्पर्श
और हवा में फैल गये
गुनगुनाहट के स्वर।
मन के कानों में भी हुई गुनगुनाहट की छुअन
एक बारगी मन चौंका
फिर मुस्कुरा दिया।
मन ने उड़ान भरी
और चाहा सम्बन्ध का नामकरण करना।
नाम देने से बदल जाएगा नज़रिया
और सोचने का ढंग
यही सोचा और थम गया मन ।
कुछ नहीं बोला / कुछ नहीं कहा
मन के मौन को देख
सम्बन्ध भी रहा चुप / निस्तब्ध।
हालांकि सम्बन्ध
कभी कुछ नहीं कहते
वे सिर्फ मन का कहा सुनते हैं
सैंकड़ों सम्बन्ध बनते हैं प्रतिदिन
और सुनते हैं मन का कहा
तब कथनों के साथ ही
नामकरण भी संस्कारित हो उठता है।
सम्बन्ध ने ताका मन की ओर
खेद मिश्रित मुस्कान बिखेरी
मन की ढीठता के नाम
सम्बन्ध और मन जानते हैं बखूबी
सम्बन्धों के निहितार्थ
और उससे जुड़ी महक को
दोनों के बीच पसरे मौन ने
कर दिया अब बयां
जो बरसों से कहा
और सुना जाता रहा है
मन व सम्बन्ध ने फिर एक दूजे को देखा
और हवा में तैर गयी
दो मृदु मुस्कानें
तब्दील हो गयी
एक नई ऊर्जा में
समा गयी आशा बन कर
रगों में, धमनियों में
शिराओं में,
मन अब
एक बार फिर चल पड़ा है।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:55 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
प्रेम कविता
****************************
शब्द उभरा
वाक्य बना
और यूं बन गयी कविता
कविता शब्दों के साथ बोली
हंसी
मुस्कुराई
और गुनगुनाई
शब्द बार-बार उभरे
होते रहे स्फुरित
और लिखी गयी कविताएं
जो हर बार छूट जाता है
रह जाता है कहीं
अनकहा / मूक
वह सब कुछ
प्रायः समाता रहा कविता में।
कविता की शाश्वतता
चमकती है
बिल्ली की बिल्लौरी आंखों की तरह
कविता की आत्मीयता
शब्द के प्रति झलकती रही।
इस आत्मीयता के साथ
जुड़ी थी शिकायतें और झगड़े।
कविता सदैव कहती रही
अभिव्यक्त करती रही स्वयं को
पर शब्द रहा
बिल्कुल चुप
शब्द प्रतीक गढ़ता
और उन प्रतीकों को चुरा लेती कविता
शब्द नितान्त अकेला है
उसके अकेलेपन की व्यथा
रह-रह कर फूट पड़ती है बाहर
कविता उसके एकान्त को
भरने का उपक्रम करती है ।
शब्द अभिभूत है
इस स्नेहिल उपक्रम से
कविता जानते हुए भी अनजान है
और शब्द चुप रहकर भी कह देता है
कि वह उससे प्रेम करता है।
परम्पराओं से बंधा शब्द नहीं जानता प्रेम की परिभाषा
पर फिर भी
वह गढ़ता है स्वयं के नित ने रूप
आत्मीय रूप
स्नेहिल रूप
और ढल जाता है एक नई कविता में
प्रेम कविता में।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:54 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
अवशेष
****************************
दरकती दीवारों में
अनगिनत दरारें
बिन कहे कह रही हैं बहुत कुछ
सदियों की धूप, पानी
और हवाओं के थपेड़े सहकर
इन खण्डहरों की निखर आई है रंगत
कक्षों के शेष बचे अवशेष
और उनकी दीवारों पर
अब भी गहरे तक जमी काई
गवाही दे रही हैं
बरसों पुरानी सभ्यता की।
इतिहास हो गई इमारतें
सैलानियों के लिये कौतूहल है।
क्षतिग्रस्त अवशेष कभी रहे होंगे हरे
और इनमें रचने-बसने वाली सरसता
आज महज महसूस की जा सकती है।
ऊंचाई पर इतिहास को संजोए
भव्य भवनों का झुंड
झांक कर देखता है नीचे बसी
सघन बस्तियों को
और कहता है मूक शब्दों में
कि इन सब का भविष्य भी
हमारे वर्तमान का ही प्रतिरूप होगा।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:51 am 1 टिप्पणी:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
रेत में मुंह
****************************
आदमी
रेत में मुंह छिपाकर
शतुर्मुर्ग सा हो गया है अब।
चारों ओर सूचनाओं का
विस्तृत जाल है
परत-दर-परत
खुलते हुए
आदमी विज्ञान हो गया है।
विज्ञान के पास है
सपनों की दुनिया
यह पहुंचा देता है इक पल में
आपको वहां
जहां हैं ताज़े खिले फूल
बिछा मखमल
बहता पानी
अप्सराएं
और आनंद।
लेकिन हज़ारों का बिल भुगतान के बावजूद
आप सूंघ नहीं सकते
फूलों की महक
अनुभव नहीं कर सकते
मखमल का मुलायमपन
और महसूस नहीं कर सकते
उन अप्सराओं को
जो लुटाती हैं आनंद के मोती
और खुशियों के सीप।
धातु के तारों से होता हुए
सम्पूर्ण विश्व
आपके हाथों में है
कई राज
जो शायद हर किसी के पास नहीं।
अब आदमी
कैद हो गया है
इस मकड़जाल में
चाह कर भी वह अब
कुछ छिपा नहीं सकता।
रेत में मुंह छिपाए
शुतुर्मुर्ग को
अब अपना चेहरा दिखाना ही होगा।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:50 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
दरवाजे
****************************
मुझे पता है
दरवाजों की परिभाषा
और उनका वजूद
मालूम है मुझे
चौखट और खिड़की की
ऊंचाई का अंतर
दरवाजे साक्षी हैं
भांति-भांति के वजूदों का
अलग-अलग चालों
और
तरह-तरह की महक का।
दरवाजा गवाह है
इतिहास का
और इतिहास की उन तारीखों का
जब-जब उसे बंद होना पड़ा
यह देखता आ रहा है
अपने घटते आकार
और क्षमताओं को
चौखट के दो दरवाज़े
अब एक हो गये हैं
और उग आई है
उसमें एक आंख
अब दरवाजे डरे हैं
सहमे हैं
भयभीत हैं।
दरवाज़े चाह कर भी
पूरे नहीं खुल पाते
अब वे इनकार करते हैं
किसी भी तरह की गवाही से
अपने वजूद में
परिवर्तन के साथ
दरवाजे खुद से बेखबर हो गये हैं।
अब खिड़कियों को
देनी पड़ रही है
दरवाजों की गवाही।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:49 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
अबकी दिवाली
****************************
दीए की बाती
अब कभी समझ नहीं पाएगी
लोकतंत्र का अर्थ
जो राजनीति की पेचीदगियों में
उलझ गया है।
‘राजनीति’ एक ऐसा शब्द
जिसके हज़ार-हज़ार अर्थ हैं
हर अर्थ हर कोण से टेढ़ा है।
सत्ता सुंदरी का मोह
कुछ भी करवा सकता है
किसी भी हद तक ।
अख़बार पढ़ते बच्चे
पूछ रहे हैं
‘घोटाले’ क्या होते हैं ?
तीस हजारी से विज्ञान भवन तक
चक्कर लगाता लोकतंत्र
थक गया है।
लोकतांत्रिक जनता रोटी चाहती है
और वे ‘चारा’ खा रहे हैं।
मुम्बई में माइकल की मादकता पर
जनता मदमस्त हुई ।
बंगलौर में परीलोक से
अवतरित हुई
अधनगी विश्व सुंदरियां।
घूंघट से झांकती दिए की बाती
बता रही है कि तेल ख़त्म होने का अंदेशा
दिग्भ्रमित मतदाता,
त्रिशंकु सरकारें,
उपेक्षित जनता
शेयरों का उछाल
महंगाई की धमाल
लक्ष्मी की प्रतीक्षा
खाली थाली
कैसे मनेगी
अबकी दिवाली ?

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:44 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
तुम्हारी आंखें
****************************
तुम्हारी आंखों का क्रम
आंखों से शुरू होता है
और आंखों पर ही खत्म हो जाता है।
वैसे आंखें बहुत कुछ कहती हैं
परन्तु तुम्हारी आंखें
सब कुछ कह जाती हैं।
सब कुछ कह जाना
बहुत मामूली नहीं होता
कई तो जुबान से ही
कुछ नहीं कह पाते
यदि वे कुछ कहते भी हैं
तो उनका कहना
कई-कई अर्थ लिए होता है ।
उनकी बातें
शब्दों के चुनाव से शुरू होती है
और अर्थों के उलझाव तक जाती है
उनके सामाजिक होने का स्वांग
मुझे सदैव विचलित करता है।
पर तुम्हारी आंखें
मौन रह कर भी
मन की बात कहती हैं
साथ ही मन की इच्छा को भी पढ़ लेती हैं।
तुम्हारी बड़ी आंखें
आशाओं का बहुत बड़ा संसार है
इसमें छिपी चमक
मेरे मन को
प्रफुल्लित कर देती है
तुम्हारी आंखें
मेरे लिए बातों का माध्यम
और मेरे शब्दों के लिए
ईर्ष्या का विषय है।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:42 am 2 टिप्पहणियां:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
गुंजाइश
****************************
यूं करो
कि अब देखने और सुनने की
बिल्कुल गुंजाइश न बचे
चमक की चकाचौंध से
चुंधिया गयी हैं आंखें
आंखों का देखा / मन पढ़ता है
और आंखें मन को वही पढ़वाती हैं
जो वे चाहती हैं।
यूं करो कि अब जो मन कहे
वही देखे आंखे।
अब समय चश्मा उतार देने का है।
चिल्लपों के बीच
कान के पर्दे सख्त हो गये हैं
शोर और संगीत का भेद
कान नहीं कर पा रहे हैं अब
बहुत कुछ सुनते हैं कान
जो मन नहीं सुनना चाहता।
यूं करे
कि कान अब बहरे हो जाएं
और सिर्फ वही समझें
जो मन कहे
वही सुने जो मन चाहे।
अब मन को ही
तय करनी होगी
देखने और सुनने की गुंजाइश।

***************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:41 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
जानना ज़रूरी है
****************************
जीने के लिए
जरूरी है जानना
कुछ बिना जाने ही जीते हैं
तो कुछ
सदैव उत्सुक रहते हैं
जानने के लिए
हम बहुत कुछ जानते हैं
और बहुत कुछ नहीं
शासन पर जमी परतों को
अब हटाने का समय आ गया है ।
आदमी के जीने के लिए की गयी कवायदें
कितनी पुख्ता हैं
ज़रूरी है इसकी सूचना
कितने फीसदी की घोषणा हुई
और कितनी फीसदी पहुंचा ?
इसके लिए टटोलने होंगे कागज़
सड़क बनाने के लिए डाले गये पत्थर
बरसों से क्यों कर रहे हैं
कोलतार का इंतज़ार?
एनिकट निर्माण की राशि
कम क्यों पड़ गयी ?
हत्या, आत्महत्या में
कैसे हुई तब्दील?
परीक्षा में अनुत्तीर्ण
मंत्री का भतीजा
साक्षात्कार में
कैसे हुआ पास ?
हमें इन सबकी चाहिए सूचना
जानना है हमें कि
जितना लिखा जाता है हमारे नाम
उतना पैसा क्यों नहीं मिलता ?
दिन भर मजदूरी करके
गढ़ते हैं महल
फिर क्यों टपकती है
हमारी खपरैली छतें ?
आटा, नमक, तेल
क्यों होते जा रहे हैं
हमारी पहुंच से दूर?
हमें इन सबकी जानकारी चाहिए
हमारे जीने के लिए
ज़रूरी है यह सब कुछ जानना।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:38 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
एक टुकड़ा आसमान
****************************
जीवन भर मर-खट कर
जुटता है कुछ पैसा
कटता है पेट
दबती हैं इच्छाएं
और भर पाती है
सम्भावनाओं की गुल्लक।
आदमी को चाहिए
एक टुकड़ा आसमान
अन्न उगाने को नहीं
घर बनाने के लिए।
अन्न उगाने के लिए
अब कोई नहीं खरीदता ज़मीन
किराए के छोटे से मकान में
टुकड़ा-टुकड़ा बंटता है आदमी
बंटती हैं खुशियां
निरन्तर बंटती जाती हैं योजनाएं।
सुनहरे कल को पाने में
आदमी की केश राशि
चांदी जैसी हो जाती है।
जमीन के टुकड़े पर
आदमी बनाता है मकान
अपने लिए नहीं
बेटे के लिए
आदमी का बेटा
आदमी से तेज होता है
सोचने में और करने में।
आदमी जीवन भर की कमाई से
खरीदता है एक टुकड़ा ज़मीन
बेटा
पाना चाहता है एक टुकड़ा आसमान
जिसमें समाई हैं
सम्भावनाएं और सर्जनाएं
बेटा जानता है
आसमान के लिए
उसकी गुल्लक बहुत छोटी है
और कुछ खाली भी
फिर भी वह
हरदम
सोते-जागते
लिखता है आसमान पाने की इच्छा।
एक टुकड़ा आसमान
कविता नहीं
एक विचार है
जिसमें मूर्तता पाने की छटपटाहट
बहुत कुछ करने की इच्छा है
कुछ नया बनाने का उत्साह है
एक टुकड़ा आसमान
बेटे के लिए
महज कल्पना नहीं है
इसमें समाई है
यथार्थता
कर्मशीलता
विचारों की सतत गति
और प्रयासों का पैनापन।
बेटे को विश्वास है
यह टुकड़ा एक दिन जरूर बनकर उभरेगा
एक सम्पूर्ण आसमान।

***************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:37 am 1 टिप्पणी:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
सूरजमुखी की कविता : बरगद के लिए
****************************
बरगद के नीचे
कुछ भी नहीं पनपता
या कि बरगद अपने नीचे
किसी को पनपने नहीं देता
प्रयोग के तौर पर
रख दिया बरगद के नीचे
सूरजमुखी लगा एक छोटा सा गमला
वाकई बरगद फुफकार उठा
अपने सान्निध्य में
किसी को पनपते देख
और उसने रोक दी
उसकी धूप
हवा
पानी
और खिलने का उत्साह।
बरगद ने रोक दी सूरजमुखी की पहचान
रोक दी उस तक आने वाली
हर नजर को ।
पहले से सूरजमुखी का बरगद से
अधिक परिचय नहीं था
बस जानते भर थे एक दूजे को
पर उसके नीचे आते ही उसे
पता चला कि
दूर से दिखने वाली विशालता
अंदर से कितनी बौनी है
सूरजमुखी ने देखा
कई कंटीली झाड़ियों को
बरगद के नीचे बिल्कुल हरी भरी ।
बरगद को इनसे
कोई शिकायत नहीं थी
सूरजमुखी के गमले की मिट्टी
काफी गीली है
हवा चुरा लेता है थोड़ी-थोड़ी
और मन में फैली
आत्मविश्वास की धूप से
गुजर जाएगा प्रत्येक ग्रहण।
सूरजमुखी को पूरा विश्वास है
कि धूप पहुंचने ही वाली है उस तक
तब उसकी आभा
सौंदर्य और वजूद के आगे
बरगद रहेगा रूखा, सूखा
और फीका पहले की तरह
लेकिन कुछ समय की कुंठा के जवाब में
सूरजमुखी का फूल लिखता है एक कविता…
‘बूढ़े, रूखे और खोखले
बरगद के तले
फूटने वाले हैं कई अंकुर
ज्वालामुखी बनकर।’

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:35 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
मन का सम्मान
****************************
कभी-कभी
हारने की हद तक
होता है हौसला।
नियमित रूप से सहनी होती है
ऐसी स्थिति
तब अंदर जुटाया हुआ आत्मविश्वास
असंतुलित हो जाता है।
निरंतर उपेक्षा
आदमी को बनाती है ढीठ।
किसी से अपेक्षाएं रखना
उसे गतिशील बनाता है
उसकी गतिशीलता
अपेक्षा करने वाले की ही
गतिशीलता का परिचायक है ।
प्रशासन चलाने का काम
कभी-कभी थोपा जाता है
ऐसे लोगों पर
जिन्हें अपेक्षा और उपेक्षा
का अंतर बिल्कुल पता नहीं होता है
ऐसे लोगों से
परेशान रहते हैं उसके अधीनस्थ
पर कह कुछ नहीं पाते हैं
कर कुछ नहीं पाते
गूंगे जो होते हैं।
गूंगापन बरसों से
रचा-बसा है इनकी रगों में
प्रशासन पर थोपे गये लोगों की
दो प्रजातियां होती हैं
दोनों विचित्र और मौलिक।
पहली
थोपे जाने की मार से मुंह की खाते हैं
दूजी
थोपे जाने की मार को
सहयोगियों पर मारते हैं
(कथित रुतबा भी हो सकता है यह)
ऐसे विचित्र अधिकारी
बहुत जल्दी पा लते हैं वांछित सफलता
पर / पहुत जल्दी खो देते हैं
अधीनस्थों से मिलने वाला
मन का सम्मान।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:27 am 1 टिप्पणी:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
‘आप’ नहीं ‘तू’
****************************
स्नेह से सराबोर
ममता का सागर
त्याग और जीवट की प्रतिमूर्ति
अविरल श्रमरत
मेरी मां की मां
जो मेरे लिए मेरी मां से बढ़कर है।
मैं उसे तब से जानता हूं
जब मैं उसके हाथों में था।
घर कैसे बनता है
घर कैसे चलता है
और घर में भौतिक सम्पदा से भी
इतर कुछ होता है
वह उसकी ज्ञाता है
इतना ज्ञान जितना कि
गृह विज्ञान विभाग की अध्यक्ष
को भी न होगा।
वह अक्षरों को बहुत धीरे-धीरे
सोच-सोच कर पहचानती
और पढ़ती है
परंतु उसके हृदय में
सद्व्यवहार का व्याकरण अंकित है
वह फर्राटे से पढ़ लेती है
सामने वाले का स्वभाव और विचार।
पैरों में श्रम की भंवरी
प्रतिपल कुछ निर्माण सर्जना
और स्नेह का विस्तृत भंवर जाल
मैं ही नहीं पूरा परिवार
उलझा हुआ है उसमें।
खेत से सर पर उठा कर लाती
हरे भुट्टों वाले डंठल
और भर देती है बोरी में
मेरे साथ भेजने को।
खाने पीने की हर फरमाइश को
पूरा करने में तत्पर है वह
उसने मुझे कई बार खिलाया है
गाजर का हलुआ।
थक कर चूर होने के बाद भी
नहीं रुकना उसकी आदत है।
निरन्तर श्रमरत रहने की
उसकी कार्यशीलता को
प्रणाम करते हुए भी
मैं यह सब आज तक उससे नहीं सीख पाया ।
पिछले बीस बरस में
मैने उसके चेहरे पर शिकन नहीं देखी
कहीं कोई शिकायत नहीं
कोई गुस्सा नहीं
वह जब भी रोती है
मैं भी खुद को रोक नहीं पाता।
उसकी अति भावुकता
मुझे कतई पसंद नहीं
दूसरों का हौसला बुलंद करने वाली
खुद रो पड़ती है
छोटी-छोटी घटनाओं पर
उसके आंसूओं की एक-एक बूंद
अन्तर्मन की अभिव्यक्ति है
मैं उसे ‘आप’ नहीं कहता
वह मेरे लिये ‘तू’ है
और इसी तू में बसा है
गहनतम अपनापन।
आज भी हर विदा की वेला में
वह मुझसे कहती है
सड़क पार करते सावधानी रखने को
और मां से नहीं झगड़ने को ।
वह मेरी कविताओं की प्रेरणा है
मेरी नानी
दुनिया की सभी नानियों से बढ़कर है
ठसी नानी बहुत कम को
मिलती है
अभी मैं इस वट वृक्ष की
छांव में
ढेरों वर्ष
गुजारना चाहता हूं।
****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:24 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
मुट्ठी में बंद सपने
****************************
हथेली के पसीने में
फिसलते हैं कभी
तो रुक-रुक कर थामता हूं
उझकने को होते हैं कभी
अंगुलियों की दरारों से तो
हाथों को ऊपर उठा कर
रोकता हूं
मुट्ठी में बंद सपनों को।
मुट्ठी में बंद सपने
जितने चमकीले होते हैं
उतने ही गतिशील भी
प्रयासों से जितने चमकते हैं ये
शिथिलता में उतने ही दुबले हो जाते हैं
कमज़ोर रक्त विहीन ।
चेहरे पर
उग आया तनाव
सपनों को चटकाने में
भागीदार बनता है
परेशानी में
सर से उपजी
कमर तक पहुंची खाज
कदमों को रोक देती है
कभी हवाएं तेज होती हैं, शीतयुक्त
तब सपने ठिठुर उठते हैं।
बहुत कुछ कहना चाहते हैं सपने
हौले से गुनगुनाना चाहते हैं सपने
सपने उड़ना चाहते हैं
तितलियों के मानिन्द
सपने दिखना चाहते हैं।
अब सपने
बहुत संवेदनशील हो गये हैं
ठेठ मन तक पहुंच रखते हैं ।
सपने खुलकर बोलना चाहते हैं इन दिनों
पर हवाएं सुनना नहीं चाहती उन्हें
अब सपनों को कुछ दिन
सचमुच धरना होगा धीरज।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:22 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
बुत
****************************
बिजली गिरी
और उठकर चली गयी
बरसात हुई
और पानी बहकर चला गया
रात हुई
और अंधेरा सुबह-सुबह
सूरज की रोशनी से धुल गया
किंतु मैं
बुत सा खड़ा था
खड़ा ही रह गया
मौसम मेरे कानों में
जाने क्या कह गया।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:20 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
आधुनिकता
****************************
वीणा के सुरों को
कुछ लोगों ने सुना
और नज़र अंदाज़ कर दिया
शास्त्रीय संगीत से
समझदार लोग
किनारा कर गये
वे शहनाई के स्वरों को
अंग्रेज़ी में बांच रहे थे
पश्चिम से आ रहा था
चीखता संगीत
जिस पर देश के
सब लोग
नाच रहे थे।

****************************
प्रस्तुतकर्ता डा. कुंजन आचार्य पर 11:18 am कोई टिप्पणी नहीं:
लेबल: एक टुकड़ा आसमान
अपेक्षा मत करो
****************************
सपने में बनाए महल को
साकार रूप देने का
पूरा-पूरा प्रयास कर रहा हूं।
मैं/आत्मविश्वास की
हर ईंट के साथ
महल को मजबूती देने की
पूरी-पूरी कोशिश कर रहा हूं।
अपनी सामर्थ्य के अनुसार
हर संभव करने में जुटा हुआ हूं
हर उम्मीद से बढ़कर
प्रदर्शन करना चाहता हूं
हर कसौटी पर श्रेष्ठता के साथ
खरा उतरना चाहता हूं मैं।
धरती पर पैर जमाकर
आसमां छूना चाहता हूं।
मैं
वह सब कुछ पाना चाहता हूं
जो मेरी कल्पनाओं में बसा है
जो मेरे मन को जंचा है
मैं वह सब कुछ पाना चाहता हूं
जिसकी खुशबू हर पल
मेरे मन के झरोखों से
मानस तक प्रवाहित होती रहती है।
बस
यही कुछ है मेरे पास
अब यदि तुम इससे ज्यादा
आशा करोगे मुझसे
तो शायद मैं वह नहीं कर पाऊंगा
तुम्हारी वे आशाएं जो
मेरी पहुंच
और मेरे वजूद से भी ऊपर हैं
जिन्हें मैं कूद कर नहीं छूना चाहता।
मैं सीढ़ी वाला आदमी हूं
बहुत धीरे-धीरे चढ़ता हूं
लापरवाही के साथ।
परिश्रम बहुत ज्यादा नहीं कर पाता हूं
बहुत चाह कर भी।
कभ-कभी भावनाएं डोल भी जाती हैं
हल्के-हल्के
हवाओं के झोंकों के साथ।
ज़रूरत से ज्यादा
आशाएं मत रखो ।
निश्चित रूप से
तुम जितना समझते हो
मैं उतना सामाजिक
और सार्वजनिक शायद नहीं हूं।
मेरा अपना एक तरीका है
सोचने
और करने का
तुम उसी से प्रभावित हो
यह मुझे मालूम है
पर तुम्हें यह नही मालूम
कि मेरे में भी
कोई ‘मैं’ है
जो मेरा अपना है
विशुद्ध व्यक्तिगत।
मैं अपने सम्पूर्ण अन्तःकरण से
श्रेष्ठ करने का प्रयास कर रहा हूं
तुम्हारी ज्यादा आशाएं
मेरे आत्मविश्वास को हिला देती हैं
कभी-कभी अंदर तक
सिहर भी उठता हूं
कि तुम मुझसे कितनी अपेक्षाएं रखते हो
अगर मैं उतना नहीं कर पाया
जितना तुम चाहते हो
तो मैं कुछ नहीं सुन सकूंगा।
मुझसे इतनी अपेक्षाएं मत करो
कि मैं विचलित हो जाऊं
मुझे अपने तरीके से
अपने सपनों के महल को
साकार रूप और जीवन्तता देने दो
जब यह पूरा हो जाएगा
तब मैं खुद आगे बढ़कर
तुमसे
बधाई स्वीकर करने आ जाऊंगा।

****************************

गीत गति

गीत गति से चलता लेकिन,
प्रीत नहीं चलती उतनी।
प्रायोगिक मन उड़ता है,
पर हवा चले उतना जितनी।
मन के भीतर दो हिस्‍से है,
मन ही मन से लड़ता है।
आकुल व्‍याकुल रोज रोज,
मन को समझाना पड़ता है।
-डा. कुंजन

हम तो सदियों से खुश हैं

जिन को पता नहीं है उनको बता दूं कि आज दुनिया भर में इंटरनेशनल हैप्‍पीनेस डे यानी खुशी का दिन मनाया जा रहा है। इसको देख कर लगता है कि बहुसंख्‍यक दुखी प्राणियों ने मिल कर एक दिन सुख का तय किया है। तय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए आज तो मैं खुश रहूंगा ही। दुनिया कि कोई ताकत मुझे आज इस खुशी से वंचित नहीं कर सकती। ये अजीब अजीब दिन बनाने वाले फिरंगी भी अजीब लोग है। अब भला कोई एक दिन ही खुश कैसे रह सकता है। हम तो भई हर हाल में खुश रहते है। हमारी खुशी से तो विदेशी भी जलते है। चाहे कोई प्रलय आ जाए। धरती फट जाए। सिलेंडर घट जाए। पेट्रोल लगातार रुलाता रहे। बम ब्‍लास्‍ट डराता रहे फिर भी हम तो भई ना डरते है ना दुखी होते है। हर हाल में खुश रहना सीख लिया है हमने।

ऐसी प्राचीन मान्‍यता है कि भारतीय सर्वगुण प्रतिभा सम्‍पन्‍न होते है। पडौसी की लडकी किसी के साथ भाग जाए तो बहुत खुश होते है। किसी दुकान में चोरी हो जाए तो भी पडौसी दुकान वाला बहुत खुश होता है। किसी के जीमण में दाल कम पड जाए तो तब तो लोग खुश होते ही होते है। हम हर विपरीत परिस्थिति में भी खुशी बटोरना जानते है। वैसे तो हम भारतीय पत्नियों से बहुत दुखी रहते है। मतलब पीडित रहते है फिर भी यही जताते है कि हमसे सुखी और कोई नहीं। एक पडौसी ने दूसरे से पूछा कि आप पति पत्‍नी खूब ठहाके लगाते हो। इसकी गूंज मेरे ड्राइंग रुम तक आती है। कैसे खुश रह लेते हो भई।

साहब ने जवाब दिया जब वह बर्तन मुझ पर फैंकती है और यदि निशाने पर लग जाता है तो वह ठहाका लगाती है और यदि निशाना चूक जाती है तो मैं ठहाका लगाता हूं। एक खतरनाक जुमला भी हमारे देश में ही चलता है कि वह खुशी को बर्दाश्‍त नहीं कर पाया और खुशी के मारे पागल हो गया। खुशी के मारे आंसू भी हमारे यहीं निकलते है। चम्‍पकलाल बदहवास से पोस्‍ट आफिस पहुंचे और पोस्‍टमास्‍टर से बोले भाई साहब मेरी पत्‍नी खो गई है, कुछ मदद करो। पोस्‍टमास्‍टर बोला- भैया ये पोस्‍ट आफिस है पुलिस स्‍टेशन नहीं। चम्‍पकलाल बोला साहब खुशी के मारे मुझे पता ही नहीं चल रहा कि कहां जाऊं और कहां नहीं। पराए दुख से दुबला होने की फितरत हमारी नहीं है। हम हर हाल में खुश है। हम इसके लिए किसी दिन के मोहताज नहीं। खुश रहने का रासायनिक समीकरण तो हमारे मन के अन्‍दर है। इसे किसी दिन में नहीं कैद कर सकते।